जो वृक्ष कठोर परिस्थितियों में उगते और बढ़ते हैं।

जो वृक्ष कठोर परिस्थितियों में उगते और बढ़ते हैं,वे पर्वत शिखरों पर भी हरियाते हैं,आँधी-तूफानों से टकराते हैं,किन्तु बगीचों की शोभा बढ़ाने वाले फूल तनिक सी सरदी-गरमी की प्रतिकूलता आते ही छुई-मुई की तरह कुम्हला जाते हैं।

प्रकृति और जीवन सभी नियमों से बँधे हैं।

प्रकृति और जीवन सभी नियमों से बँधे हैं।यहाँ पर नियम चलते हैं। जो नियमों का सही पालन कर लेता है,वही सफल होता है। बीज,वृक्ष और बीज के बीच की प्रक्रिया प्राकृतिक नियमों के अनुरूप होती है और ये हर अवस्था में एकदूसरे से अविच्छिन्न रूप से सबंधित होते हैं।

युवा दिल की धडकनों में………..

युवा दिल की धडकनों में समाज और राष्ट्र के सुनहले सपने संवेदित होते हैं,उनकी आंखो की चमक में भविष्य की योजनाएँ चमकती हैं। उनके विचारों में आंतरिक एवं भौतिक जीवन के सूत्र निखरते हैं। उनकी आशाओं और उमंगों में बुढ़ापा भी यौवन जैसा उमंगित होता है।

अनुभवी की आँखें आर-पार देखती हैं।

अनुभवी की आँखें आर-पार देखती हैं। वह ऐसा देखता है,जैसे किताबों के पृष्ठों में साफ-साफ उभरे अक्षर। वह अक्षरों के मेल से बने शब्द,शब्दों से संरचित वाक्य और वाक्यों से रचित ग्रंथ को पढ़ता ही नहीं,बूझता और बोध करता है।

बुराई इस दुनिया में बहुत है ।

बुराई इस दुनिया में बहुत है,पर इतनी नहीं जिसे अच्छाई से अधिक कहा जा सके।अँधेरा कितना ही सघन या व्यापक क्यों न हो,वह उतना नहीं हो सकता जो प्रकाश से भारी पड़े और बाजी मारने की हिम्मत करे। संसार में दुष्ट-दुराचारियों की भरमार है। इतने पर भी वह समुदाय इतना बड़ा या सामर्थ्यशाली नहीं है,जो सज्जनों की तुलना में किसी भी दृष्टि से बढ़ – चढ़कर माना जा सके ।

शिक्षा की सार्थकता

शिक्षा की सार्थकता तब बनती है जब उसकी छ्त्रछाया में अधिक सुसंस्कृत, अधिक प्रतिभावान एवं अधिक क्रियाकुशल व्यक्तित्व का निर्माण हो। इसके लिए उपयुक्त वातावरण बनाना अध्यापनतन्त्र का कर्तव्य है।

मानवी चेतना पर….

ब्रहमाण्ड के कण-कण में,घट-घट में ईश्वरीय सत्ता मौजूद है,पर वह न तो दिखाई पड़ती और न ही अनुभव में आती है।मानवी चेतना पर मल-विक्षेपों के इतने घने आवरण चढ़े हुए हैं कि उसकी निज की सत्ता भी प्रकाश में नहीं आ पाती।

जैविक रूप से कमजोर प्राणी।

अब तक मानव विकास के कई चरणों से गुजरा है। जैविक रूप से कमजोर प्राणी होने के बावजूद यदि उसने स्वयं को अन्य सभी प्राणियों से अधिक विकसित एवं उन्नत होने का दरजा पाया हुआ है तो केवल उसकी चेतना व ज्ञान संपदा के कारण ही है ।

यदि सच को गहराई से अनुभव करें………….

मनुष्य अपने साथ केवल तन व मन लेकर पैदा हुआ है। आध्यात्मिकता उसके साथ नहीं जन्मी, परंतु यह कथन अधूरा है, यदि सच को गहराई से अनुभव करें तो आध्यात्मिकता अपने चरित्र, चिंतन व व्यवहार के परिमार्जन से स्वस्फूर्त विकसित होती है।

वस्तुएँ क्षणिक सुख दे सकती हैं।

वस्तुएँ क्षणिक सुख दे सकती हैं। वासना और तृष्णा की मदिरा में कुछ ही क्षण उन्मत्त रहा जा सकता है। उसकी परिणति तो दूनी अशांति, दूनी हानि,असफलता में ही होती है। इसलिए हमें मानसिक संस्थान को शुद्ध करने का सबसे अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अपनी एक-एक प्रवृत्ति का सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए।