व्यंग्य – विनोद तभी तक अच्छा है।

व्यंग्य – विनोद तभी तक अच्छा है,जब तक वह अपनी मर्यादा में रहे और किसी के स्वाभिमान अथवा गौरव पर ठेस न पंहुचाए और दोनों पक्ष समान रूप से प्रसन्न होते रहें , अन्यथा यह भी एक अपमान का ही रूप है जिससे विनाश उत्पन्न होता है।

मनुस्य समाज का निर्माण इस रीति से हुआ है

मनुस्य समाज का निर्माण इस रीति से हुआ है कि उसमे परस्पर मिलजुल कर रहने और सदभाबों की इस्थिरता होने से ही जीवन क्रम का ठीक प्रकार चलते रह सकना सम्भव हो सकता है। जिसके जीतने प्रेमी ,मित्र , स्वजन और सहयोगी होगे , वह उतना ही प्रसन रहेगा और उतनी ही प्रगति कर सकेगा । जो शत्रुओं से घिरा है, जिसे चारो ओर से निंदा , उपेक्षा एवं तिरस्कार ही प्रापता होता है ,उसके लिए कोई महत्वपूर्ण प्रगति कर सकना संभव नहीं , भले ही वह कितना ही बुधीमान क्यों न हो । इसके विपरीत कम योग्यता वाले व्यक्ति भी मित्रों और सहयोगियों कि सहायता , सद्भावना के बल पर उन्नति के उच शिखर तक पहुचते देखे गए है।

जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिये हमें स्वस्थ,………..

जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिये हमें स्वस्थ, सबल, रचनात्मक मनोभूमि की अत्यंत आवश्यकता है। इसके बिना हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे प्रत्युत हमारा असंतुलित मन ही हमारे विनाश का कारण बन जायेगा। इसके लिये आत्म निरीक्षण द्वारा मनोविकारों को समझा जाय। अपनी मनोभूमि का पूरा-पूरा निराकरण किया जाय। जो भी नकारात्मक विचार हो उनसे पूर्णतया मुक्त होने का प्रयत्न किया जाय। स्मरण रहे आत्म-निरीक्षण के प्रक्रिया इतनी गंभीर भी न हो जिससे जीवन के अन्य अंगो की उपेक्षा होने लगे। केवल अपने बारे में ही सोचते रहना, अपने व्यक्तित्व में घुसकर ही ताना-बाना बुनते रहना भी आगे चलकर मानसिक दोष बन जाते है। आवश्यकता इस बात की अपनी मनोविकृति के बारे मे गंभीरता से सोचा जाय और फिर उसे सुधारने के लिये तत्परतापूर्वक लग जाया जाय।

हमें कोई गुमराह न कर सके

हमें कोई गुमराह न कर सके, इतना हममें विवेक हो, कोई हम पर दबाव न डाल सके, इतना हममें आत्मबल हो, हम अपनी कृति को प्रामाणिक बना सके, इतना हममें आत्मविश्वास हो। हम अन्याय के विरुद्ध लड़ सकें इतना हममें शौर्य हो। हम अपने आदर्शमय पथ पर अडिग हो कर समुन्नत रहें, ऐसी हमारी साधना हो, पलायन नहीं संघर्ष, बुज़दिली नहीं साहस, अकर्मण्यता नहीं शौर्य ही मनुष्य का गौरवपूर्ण परिभाषा है।

मन का निर्विषय होना ही मुक्ति है।

मन का निर्विषय होना ही मुक्ति है। अतः इस भवबंधन से मुक्ति होने की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को अपना मन निरासक्त अर्थात विषयों से मुक्त रखना चाहिए ।

विपत्ति और अतृप्ति से भरा नीरस जीवन यह बताता है

विपत्ति और अतृप्ति से भरा नीरस जीवन यह बताता है की अंत:कारण की गरिमा सूखने और झुलसने लगी है। जड़ें मजबूत और गहरी हों तो जमीन में से पेड़ के लिए पर्याप्त जीवन-रस प्राप्त कर लेती हैं और वह हरा-भरा बना रहता है। आंतरिक श्रद्धा यदि मर न गई हो तो अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सरसता और प्रफुल्लता खोजी जा सकती है। उल्लास सुख-साधनों पर नहीं उतकृष्ट दृष्टिकोण पर निर्भर है ।

विषम पारिस्थितियाँ।

मनुष्य जीवन मे कई बार ऐसी विषम पारिस्थितियाँ आती हैं, जब वह एक निर्णय सरलता से नहीं कर पाता। श्रेय के लिये, शक्तिप्राप्ति के लिए विजय और सफलता के लिए वह कोई उद्योग करना चाहता है, पर सांसारिक मोह, माया, आत्मिक दुर्बल्ता, निराशा और असफलता का भय उसे वह कार्य न करने को रोकता है।

कर्मकांड के क्रिया-कृत्य

कर्मकांड के क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान बैठना या उन्हें एकदम निरर्थकमान लें, दोनों ही हानिकारक हैं | उनकी सीमा भी समझें, लेकिन महत्व भी न भूलें | संक्षिप्त करें ; पर श्रद्धासिक्त मनोभूमि के साथ ही करें, तभी वह प्रभावशाली बनेगा और उसका उद्येश्य पूरा होगा |

धार्मिक कर्तव्य

कन्या और पुत्र दोनों ही माता की प्राणप्रिय संतान हैं। ईश्वर को नर और नारी दोनों दुलारे हैं। कोई भी निष्पक्ष और न्यायशील माता-पिता अपने बालकों में इसलिए भेदभाव नहीं करते कि वे कन्या हैं या पुत्र हैं। ईश्वर ने धार्मिक कर्तव्यों एवं आत्मकल्याण के साधनों की नर और नारी दोनों को ही सुविधा दी है। यह समता, न्याय और निष्पक्षता की दृष्टि से उचित है, तर्क और प्रमाणों से सिद्ध है। इस सीधे-सीधे तथ्य में कोई विघ्न डालना असंगत ही होगा।

सफलता पाने के सूत्र ।

जीवन में सफलता पाने के जितने साधन बतलाये गये हैं, उनमें विद्वानों ने इन सात बन्धनों को प्रमुख स्थान दिया है-परिश्रम एवं पुरुषार्थ, आत्म विश्वास एवं आत्मनिर्भरता, जिज्ञासा एवं लगन. त्याग एवं बलिदान, स्नेह एवं सहानुभूति, साहस एवं निर्भ.ता, प्रसन्नता एवं मानसिक संतुलन। जो मनुष्य अपने में इन सात साधनों का समावेश कर लेता है, वह किसी भी स्थिति का क्यों न हो, अपनी वांछित सफलता का अवश्य वरण कर लेता है।