संसार की बनावट।

संसार की बनावट–बुनावट आभासी माया की सतरंगी – बहुरंगी संरचना से हुई है । यह संसार अत्यंत मनोरम झलकता है, पर होता नहीं है । यहाँ कुछ भी स्थाई, स्थिर व साथ नहीं है।

जीवन निर्माण|

युवावस्था में यदि जीवन निर्माण का सही मार्गदर्शन मिल जाए तो जीवन के उपवन में अनेकानेक उपलब्धियों के पुष्प खिलते चले जाते हैं | इस अवस्था को भविष्य निर्माण की आधारशिला कहा जा सकता है | उपयुक्त दिशा निर्देशों के अभाव में, उपयुक्त मार्गदर्शन के अभाव में एवं उपयुक्त साथियों के अभाव में जीवन अनगढ़ बनता चला जाता है |

ऊँचा चढ़ने के लिए

ऊँचा चढ़ने के लिए लाठी की और जल्दी पहुँचने के लिए वाहन की आवश्यकता पड़ती है | यह उपकरण बहुत ही उपयोगी और आवश्यक हैं, पर यह ध्यान रखना चाहिए की स्वतन्त्र रूप से कोई जादुई शक्ति से सम्पन्न नहीं हैं | स्वस्थ शरीर को बलिष्ठ बनाने में वे सहायता भर करते हैं |

सिखाने की आवश्यकता|

आत्मोत्कर्ष की जिन कक्षाओं का सैद्धांतिक और व्यावहारिक पाठ्यक्रम सीखने, सिखाने की आवश्यकता पड़ती है| वे चिंतन की उत्कृष्टता एवं कर्तृत्व के आदर्शवादिता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं| उनकी उपेक्षा करके मात्र कर्मकांडों के सहारे कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लग सकती है ।

अपने पुरुषार्थ को सिद्ध करे

अपने पुरुषार्थ को इस स्तर का सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है, वरन उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्र में सम्मिलित रहा है | यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यान्यों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है |

ईश्वर का न्याय

अपने यहाँ तो अनेक अपराधी दंड पाने से बच जाते हैं, पर सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी न्यायाधीश के न्याय में किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते। इस वास्तविकता से असहमत रहने के कारण ही लोग प्राय: नास्तिक बन जाते हैं- कर्मफल की मान्यता का उपहास उड़ाते हुए स्वेच्छाचार बरततें हैं। विवेक होने की समझ तभी आती है जब समयानुसार क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आ खड़ी होती है।

समय का नाम ही जीवन है

अधिकांश लोग आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद करते रहे हैं। एक-एक दिन करके सारी आयु व्यतीत हो जाती है और अंतिम समय वे देखते हैं कि उन्होंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जिंदगी के दिन यों ही बिता दिये। इसके विपरीत जो जानते हैं कि समय का नाम ही जीवन है वे एक -एक क्षण कीमती मोती की तरह खर्च करते हैं और उसके बदले में बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसका निर्वाह एकाकी नहीं हो सकता। सहकारिता की इस सत्प्रवृत्ति का सर्वप्रथम शिक्षण परिवार की सुरक्षा एवं प्रगति का ध्यान रखना चाहिए। यदि परिवार संस्था को सद्गुणों की प्रयोगशाला, पाठशाला, फैक्ट्री अथवा नर्सरी मानकर चला जाय और इसके लिए ‘एक आँख प्यार की-दूसरी सुधार की’ वाली अपनायी जाए, तो यह समाज की सबसे सच्ची सेवा कही जाएगी।

वर्तमान युग में विश्व अनेकानेक स्तर की समस्याओं।

वर्तमान युग में विश्व अनेकानेक स्तर की समस्याओं, विपत्तियों एवं विभीषिकओं से घिरा हुआ है। साधन संपन्न एवं बुद्धिमान कहे जाने वाले मानव को आज उद्विग्न एवं आशंकित बनाए रखने वाली विपन्नताओं की बाढ़-सी आ गयी है। गहराई से विचार करते हैं, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि चिन्तन व चरित्र की दृष्टि से सड़-गले परिवार अपने कुसंस्कारों की कीचड़ से जिन जहरीले कृमि-कीटकों को जन्म देते हैं, वे ही जनमानस को विकृत करके रख देते हैं।

वायुप्रदूषण की रोकथाम का रास्ता बंद हो रहा है।

वन कटते जा रहे है। फलस्वरूप वायुप्रदूषण की रोकथाम का रास्ता बंद हो रहा है। जमीन में जड़ों की पकड़ न रहने से हर साल बाढ़े आती हैं, भूमि कटती है, रेगिस्तान बनते हैं। नदियों की गहराई कम होते जाने से पानी का संकट सामने आता है। फर्नीचर, मकान और जलावन तक के लिए लकड़ी मुश्किल हो रही है। वन काटने की अनेक हानियों को जानते हुए भी, आवास के लिए खाद्य के लिए सड़कों, स्कूलों और बाँधों के लिए जमीन तो चाहिए ही। यह सब जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम ही तो हैं। इन्हीं में से एक अनर्थ और भी जुड़ जाता है, शहरों की आबादी का बढ़ना। बढ़ते हुए शहर, घिसपिच की गंदगी के कारण नरक तुल्य बनते जा रहे हैं।