एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था।

एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था। ‘‘कृपया बेकार मत बैठिये। यहाँ पधारने की कृपा की है तो मेरे काम में कुछ मदद भी कीजिये। साधारण मनुष्य जिस समय को बेकार की बातों में खर्च करते रहते हैं, उसे विवेकशील लोग किसी उपयोगी कार्य में लगाते हैं। यही आदत है जो सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों को भी सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देती है।

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प्रतिदिन एक घंटा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करे।

प्रतिदिन एक घंटा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करे तो उतने छोटे समय से भी वह कुछ ही दिनों में बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य पूरे कर सकता है। एक घंटे में चालीस पृष्ठ पढ़ने से महीने में बारह सौ पृष्ठ और साल में करीब पंद्रह हजार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। यह क्रम दस वर्ष जारी रहे तो डेढ़ लाख पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। इतने पृष्ठों में कई सौ ग्रंथ हो सकते हैं। यदि वे एक ही किसी विषय के हों तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन सकता है।

खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है।

खोई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता, उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। जिस प्रकार धन के बदले में अभिष्ठित वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी कीर्ति आरोग्य, सुख -शांति, मुक्ति आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो खरीदी जा सकती है।

जीवन का महल समय की -घंटे -मिनटों की ईंटों से चिना गया है।

जीवन का महल समय की -घंटे -मिनटों की ईंटों से चिना गया है। यदि हमें जीवन से प्रेम है तो यही उचित है कि समय को व्यर्थ नष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ ही चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा था-मैंने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।’

शिक्षक से बड़ा कोई धर्म नहीं।

शिक्षक से बड़ा कोई धर्म नहीं। वह चाहे तो समाज और समय की दिशा बदल सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का ज्ञान भले ही कम हो, लेकिन उसे इच्छा शक्ति और चरित्र का धनी होना चाहिए। आज समाज को व्याख्यान नहीं, अपने जीवन से शिक्षण देने वालों की आवश्यकता है।

शिक्षक को अपनी गरिमा का बोध होना चाहिए।

शिक्षक को अपनी गरिमा का बोध होना चाहिए। सौभाग्य से आज शिक्षक की स्थिति औसत भारतीय नागरिक से कहीं अच्छी है। उसके समक्ष धनापार्जन की नहीं, देश के भाग्य विधाताओं के निर्माण की चिंता होनी चाहिए। शिक्षक वह सौभाग्यशाली प्रतिभा है, जिसके हाथ सीधे गीली माटी तक पहुँचते हैं। समाज को बदलने के लिए आज संसाधनों की कमी नहीं है, सृजनात्मक विचारों की जरूरत है। यह दायित्व शिक्षकों को ही आगे बढ़कर निभाना चाहिए।

भारत को महान बनाने में शिक्षा जगत को जबरदस्त क्रांति करनी होगी।

भारत को महान बनाने में शिक्षा जगत को जबरदस्त क्रांति करनी होगी। यह एक ऐसा तंत्र है, जिसकी पहुँच समाज के हर व्यक्ति तक है। आज हर क्षेत्र को अच्छे और ईमानदार व्यक्तियों की तलाश है, जिसे शिक्षक ही पूरा कर सकते हैं। यह कार्य तभी संभव है, जब शिक्षक को अपनी गरिमा का बोध हो जाये। वह चाहे तो सामाजिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन कर सकता है।