सम्पति

बेईमानी से जमा की हुई सम्पति ऐसी है जैसे मृग के लिए कस्तुरी। न उस मृग को नींद आती है, न कस्तुरी को। वह सम्पदा किस काम की जो कस्तुरी की भाँति दुःखदायी हो।

मूल्यांकन

मनुष्य के मूल्यांकन कि कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतिओं को नहीं, उसके सद्विचरों और सत्कर्मो को मानेंगे।

धर्म का शिक्षण

धर्म का शिक्षण भी अनुभव के आधार पर ही होना चाहिए। यद्यपि ऐसे अनुभव प्राप्त व्यक्ति कम ही होते हैं, किन्तु इनका सर्वथा अभाव किसी काल में नहीं होता है। पश्चिम जगत में इन्हें रहस्यवादी कहते हैं। यह व्यक्ति किसी भी धर्म के हों, एक समान सत्य का शिक्षण करते हैं।

” आत्म-सम्मान की आकांक्षा “

जीवन को अनके दिशाओं में उन्नत एवं समृद्ध बनाने वाली उत्पादक शक्ति का नाम है – ” आत्म-सम्मान की आकांक्षा “। जो अपने को प्रतिष्ठित, बड़ा आदमी, महापुरुष, अधिकारी बनाना चाहता है, वह उसके लिए उपाय ढूंढेगा और यह सच्चाई सूर्य की तरह स्पष्ट है – “ढूंढने वाले को मिलता है। ” जिसने खोजा है, उसने पाया है।

संस्कृति एवं कला की राष्ट्रीय तथा स्थानीय पहचान जरूरी है।

सांस्कृतिक उद्यमों को मात्र आर्थिक दृष्टि से ही नहीं देखना चाहिए, क्योंकि यह समाज एवं संस्कृति के मूल में हैं। सामाजिक एवं सामुदायिक विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप संस्कृति एवं कला की राष्ट्रीय तथा स्थानीय पहचान जरूरी है। नीतियाँ ऐसी हों जो सांस्कृतिक उद्यमों का चौमुखी विकास कर सकें ।

समय की कीमत

वही वयक्ति जीवन में सफल हुए हैं जिन्होंने समय की कीमत पहचानी है। सफलता के अवसर जीवन में आ सकते हैं, परंतु समय कि अनुकूलता का होना भी आवश्यक है। मनुष्य समय का उपयोग सही समय पर करता है, तभी सफल होता है। अवसर पर उपयुक्त कार्य कर लेना ही आवश्यक है। समय-समय से ही सभी कार्य अच्छे लगते हैं। जो वयक्ति समय बरबाद करता है,वही बाद के दिनों मे पछताता है तथा वक्त के थपेरे खाता है।

सभी कार्य निश्चित समय पर हों तो

सभी कार्य निश्चित समय पर हों तो सभी मनुष्यों का जो समय बच सकता है, उसे स्वाध्याय, समाजसेवा, स्वयं कि योग्यता बढ़ाने मे लगा सकते हैं। समय रहा तो धन और परमात्मा दोनों पाए जा सकता हैं।

संदेश

संदेश एक ही है – हम दूषित कर्मों से बचे, अपने ज्ञान को माया द्वारा अपहृत किए जाने से रोके तथा सद्बुद्धि के मार्ग पर चलें। प्रभु पहले ही कह चुके हैं कि यह माया बड़ी दुस्तर है। प्रभु का सतत स्मरण, गायत्री मंत्र का भावपूर्वक किया गया जप, सत्संग, स्वाध्याय ही हमें आसुरी स्वभाव कि ओर ले जाने से, दुर्बुद्धि के मार्ग पर जाने से रोक सकते हैं।

प्रभावी समयदान

“प्रभावी समयदान वही है, जिसमें समय,श्रम और संकल्प का त्रिविध समन्वय परिपूर्ण रूप में हुआ हो । ऐसा समयदान ही युग परिवर्तन
की महान प्रक्रिया संपन्न का सकने में समर्थ हो सकता है।

तपस्वी

श्रेष्ठ तपस्वी तो वह है जो अपने लिए कुछ चाहे बिना समाज के शोषित, उत्पीड़ित, दलित और असहाय जनों को निरंतर ऊपर उठाने के लिए परिश्रम किया करता है।