पवित्र आत्मा समझिए

हर व्यक्ति को अपनी ही तरह पवित्र आत्मा समझिए और उससे आंतरिक प्रेम कीजिए।कोई भी प्राणी नीच, पतित या पापी नहीं है, तत्वतः वह पवित्र ही है। भ्रम, अज्ञान और बीमारी के कारण वह वह कुछ समझने लगता है। इस बुद्धि-भ्रम का ही इलाज करना है।बीमारी को मारना है और बीमार को बचाना है। इसलिए दुष्ट और दुष्टता के बीच में फर्क करना सीखना चाहिए।

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अज्ञान एक प्रकार की बीमारी

आत्मा किसी का दुष्ट नहीं है, वह तो सत्य, शिव और सुंदर है, सच्चिदानंद स्वरुप है। दुष्टता तो अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है, यह अज्ञान एक प्रकार की बीमारी ही तो है। अज्ञानरूपी बीमारी को हटाने के लिए हर उपाय काम में लाना चाहिए, परंतु किसी से व्यक्तिगत द्वेष ना मानना चाहिए। व्यक्तिगत द्वेष-भाव जब मन में घर कर लेता है, तो हमारी निरीक्षण-बुद्धि कुंठित हो जाती है। वह नहीं पहचान सकती की शत्रु में क्या बुराई है और क्या अच्छाई है।

परमात्मा कैसे हैं ?

“परमात्मा सरल ,दयालु और भक्त–वत्सल तो है , पर वह शौर्य – वीर्य संयुक्त भी है । सृष्टि संचालन को सूक्ष्म गतिविधियों पर ध्यान जमाकर देखा जाय तो पता चलेगा कि वह कितना निर्भीक है? विश्व की व्यवस्था के लिए वह कठोर से कठोर काम भी निडर और निशंक होकर किया करता है ।

सफलता का द्वार

सफलता का द्वार उन लोगों के लिए है जो आशा, उत्साह, हिम्मत और शक्तिपूर्वक द्वार पर बैठी हुई दुर्बलता की सिंहनी को पछाड़ सकते है , जिनके मन में उत्साह नहीं ,आशा नहीं और संघर्षों से लड़ने की चाह नहीं, उनके लिए संसार में सर्वत्र दर ही दर, असफलता ही असफलता है।

सहानुभूति प्रेम से बड़ी चीज है।

सहानुभूति प्रेम से बड़ी चीज है। प्रेम प्रतिदान माँगता है। सहानुभूति उससे भी की जा सकती है, जो हम से नहीं करते। संसार मे कष्टों से पीड़ित व्यक्ति सहानुभूति के मरहम से प्रगति कर रहा है। आत्मसंतोष एवं प्रेम पाने के लिए सहानुभूति सबसे अचूक उपाय है। जिस हृदय में सहानुभूति होती है, वह महान है और जो प्रदान करता है, वह उससे भी महान है। ऐसा देश, समाज जहाँ भरे-पूरे हृदयों से सहानुभूति की गंगा बह रही हो, वहाँ का मानव-जीवन कभी बंजर नहीं हो सकता।

सहानुभूति प्रेम से बड़ी चीज है।

सहानुभूति प्रेम से बड़ी चीज है। प्रेम प्रतिदान माँगता है। सहानुभूति उससे भी की जा सकती है, जो हम से नहीं करते। संसार मे कष्टों से पीड़ित व्यक्ति सहानुभूति के मरहम से प्रगति कर रहा है। आत्मसंतोष एवं प्रेम पाने के लिए सहानुभूति सबसे अचूक उपाय है। जिस हृदय में सहानुभूति होती है, वह महान है और जो प्रदान करता है, वह उससे भी महान है। ऐसा देश, समाज जहाँ भरे-पूरे हृदयों से सहानुभूति की गंगा बह रही हो, वहाँ का मानव-जीवन कभी बंजर नहीं हो सकता।

दीपक का प्रकाश

दीपक के नीचे अंधेरा ही रहता है। उसका प्रकाश दूर पड़ता है। इसी प्रकार साधू-महात्माओं को उनके आस-पास वाले लोग समझ नहीं सकते, दूर रहने वाले उनके भाव से मुग्ध हो जाते हैं।