सन्मार्ग

गुरुजनों से या ईश्वर से आशीर्वाद माँगना ही उचित है क्योंकि उनका अंतः करण सदा ही सत्प्रयत्न करने वाले के लिए स्वयमेव प्रवाहित होता रहता है। जैसे ही हम सन्मार्ग की और कदम उठाते हैं, वैसे ही वह आशीर्वाद और भी बलपूर्वक हमारे साथ संयुक्त हो जाता है, परंतु यदि हम कुपथ पर चलें या आलसी, प्रमादी बने बैठे रहें और ईश्वर से सहायता की आशा रखें, तो ऐसे आशा फलवती नहीं हो सकती।

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कठोर श्रम

कठोर श्रम में अनवरत लगे रहने का अभ्यास डालो । पढ़ते समय सारी दुनिया को एक ओर रख दो ओर पुस्तकों मे लेखक के विचारधारा में डूब जाओ । यही तुम्हारी समाधि है । यही तुम्हारी उपासना है ओर तुम्हारी पूजा है । कठिन परिश्रम करना सीखो । खूब गढ़कर जमकर मेहनत करो ओर अपने उच्च तथा पवित्र आदर्श को कभी मत भूलो । शास्त्र ओर शस्त्र , बद्धिबल ओर बाहुबल , दोनो का उपार्जन करो ।

पुरुषार्थी

सच्चा पुरुषार्थी वास्तव मे वही है जो बार-बार असफलता को देखकर भी अपने प्रयत्न में शिथिलता न आने दे और हर असफलता के एक नये उत्साह से सफलता के लिय निरन्तर काम में जुटा रहना निराशा का सर्वश्रेष्ठ और सृजनानात्मक उपचार है। अपने को योग्य बनाकर पूरे संकल्प के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। सफलता की सिद्धि मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।

भगवान चेतन हैं

भगवान चेतन हैं, व्यापक हैं, अस्तु निराकार हैं। आकार एक देशीय वस्तु का होता है। पदार्थ ही दिखाई पड़ता है , चेतना न आँखों से देखी जा सकती है, न किसी यंत्र या साधन की पकड़ में आ सकती है। वह बुद्धिगम्य है।

अच्छे काम के लिए ही ईश्वर आशीर्वाद फलदायी होता है बुरे काम के लिए नहीं।

गुरुजनों से या ईश्वर से आशीर्वाद माँगना ही उचित है क्योंकि उनका अंतः करण सदा ही सत्प्रयत्न करने वाले के लिए स्वयमेव प्रवाहित होता रहता है। जैसे ही हम सन्मार्ग की ओर कदम बढ़ाते हैं, वैसे ही वह आशीर्वाद और भी बलपूर्वक हमारे साथ संयुक्त हो जाता है, परंतु यदि हम कुपथ पर चलें या आलसी, प्रमादी बने बैठे रहें और ईश्वर से सहायता की आशा रखें, तो ऐसे आशा फलवती नहीं हो सकती।

आराम: विश्वासघात

आराम करना उनके प्रति विश्वासघात करना है, जिन्होनें अनवरत श्रम करके हमें उठ सकने योग्य और सुख पा सकने योग्य बनाया। यह विश्वासघात उन असंख्य लोगों के प्रति भी है, जो कभी – कभी आराम कर ही नहीं पाते ।

मानव जाति को दुर्भाव, दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों से बचाने के लिए सबसे अधिक आवश्यकता बौद्धिक क्रांति की है।

मानव जाति को दुर्भाव, दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों से बचाकर सत्कर्मों की ओर ले चलने के लिए सबसे प्रथम और सबसे अधिक आवश्यकता बौद्धिक क्रांति की है। जिन विचारों से समाज इस समय ओत-प्रोत है यदि उनमें परिवर्तन न हुआ तो कोई भी ऊपरी उपचार फलप्रद न होगा ।