वास्तविक आनंद

‘भोग से रोग उत्पन्न होते हैं’ इस कहावत के अनुसार उन सभी सुखों को जिनसे इंद्रियों के विषय तृप्त होते हों, वास्तविक आनंद की कोटि में नहीं रखा जा सकता। स्वाभाविक आनंद से ही यदि आत्मतृप्ति हो जाती तो संभवतः यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण न होता, जितना लोगों के सामने है। पूर्ण आनंद वह है, जहाँ विकृति न हो। किसी तरह की आशंका, अभाव या परेशानी न उठानी पड़ती हो। स्वाभाविक जीवन में जो आनंद मिल रहा है, उसमे हमारा अभ्यास बन गया है, इसलिए वह अनुचित हो तो भी वैसा नहीं लगता।

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विचारधारा

मनुष्य बाँस की पोली बाँसुरी की तरह है उसमे जैसे फूँक फूँकी जाती है वैसे ही स्वर निकलते हैं। दर्पण की तरह हैं – मनुष्य जीवन, आंतरिक मान्यताओं का स्वरूप ही उस दर्पण में दीख पड़ता है। विचारधारा जैसी फूँक फूँकती है मनुष्य वैसा ही सोचता, बोलता और करता है। इसलिए समाज को बदलना हो तो व्यक्तियों को बदलना पड़ेगा। व्यक्तियों को बदलना है तो उनकी आस्थायाएँ और विचारधारा उलटनी पड़ेगी। उल्टे को उल्टा कर देने से सीधा हो जाता है। आज उलझे हुए लोकमानस को उलट दिया जाए तो व्यापक नरक को सुव्यवस्थित स्वर्ग एवं सतयुग में बदला जा सकता हैं। विचारधारा बदल जाने ही को कायाकल्प कहते हैं।

एक विचार ले लो। उसी एक विचार के अनुसार अपने जीवन को बनाओ।

एक विचार ले लो। उसी एक विचार के अनुसार अपने जीवन को बनाओ। उसी को सोचो, उसी का स्वप्न देखो और उसी पर अवलम्बित रहो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, स्नायुओं और शरीर के प्रत्येक भाग को उसी विचार से ओत प्रोत होने दो और दूसरे सब विचारों को अपने से दूर रखो। यहीं सफलता का रास्ता है और यही वह मार्ग है, जिसने महान धार्मिक पुरुषों का निर्माण किया है।

कर्तव्यो का पालन

मनुष्य अपनी स्थिति के अनुसार अपने कर्तव्यो का पालन तत्परता से करते रहे तो भी मृत्यु का भय उसे नहीं सताने पाये । फिर वह कर्तव्य छोटे हो अथवा बड़े साधारण हो अथवा असाधारण कर्तव्य हीन अकर्मण्यता तो सजात मृत्यु ही कही गई है ।

आप सरल मार्ग को अपनाइए।

आप सरल मार्ग को अपनाइए, लड़ने बड़बड़ाने और कुढ़ने की नीति छोड़कर दान, सुधार, स्नेह के मार्ग का अवलंबन लीजिए। एक आचार्य का कहना है कि प्रेम भरी बात, कठोर लात से बढ़कर है। बुराई को मिटाने का यही तरीका कि अच्छाई को बढ़ाया जाए। आप चाहते हैं कि इस बोतल से हवा निकल जाए, तो इसमें पानी भर दीजिए। बोतल में से हवा निकालना चाहें, पर उसके स्थान पर कुछ भरें नहीं, तो आपका प्रयत्न बेकार जाएगा। एक बार हवा को निकाल देंगे, दूसरी बार फिर भर जाएगी। संसार में जो दोष आपको दिखाई पड़ते हैं, उनको मिटाना चाहते हैं, तो उनके विरोधी गुणो को फैला दीजिए। आप गंदगी बटोरने का काम क्यो पसंद करें, उसे दूसरों के लिए छोड़िए। आप तो इत्र छिड़कने के काम को ग्रहण कीजिए।

क्या तुम जानते हो तुम्हारे भीतर अभी भी कितनी तेज कितनी शक्तियाँ छिपी हूई है?

क्या तुम जानते हो तुम्हारे भीतर अभी भी कितनी तेज कितनी शक्तियाँ छिपी हूई है?क्या कोई वैज्ञानिक भी इन्हे जान सका है?मनुष्य का जन्म हुए लाखो वर्ष हो गये पर अभी तक उसकी असीम शक्ति का केवल एक अत्यन्त क्षुद्र भाग ही अभिव्यक्त हुआ है । इसलिय तुम्हें यह न कहना चाहिए की तुम शक्ति-हिन हो । तुम क्या जानो की ऊपर दिखाई देने वाले पतन की ओट मे शक्ति की कितनी संभावनाएँ है? जो शक्ति तुममे है,उसके बहुत ही कम भाग को तुम जानते हो। तुम्हारे पीछे अनंत शक्ति और शांति का सागर है।

सकारात्मक विचार अपनाओ केवल सत्यकार्य करते रहो।

अपने आप में विश्वास। अपनी अंतर्निहित दिव्यता में विश्वास। सकारात्मक विचार अपनाओ केवल सत्यकार्य करते रहो, सर्वदा पवित्र चिंतन करो बुरे संस्कारो को रोकने का बस यही एक उपाय है। यदि कोई हजार बार प्रयास करके भी वह हर बार असफल होता है, तो भी एक बार प्रयास करें। मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है। हम जो कुछ होना चाहें। उसकी शक्ति भी हमी में है। निष्काम सेवा करें। एक सुदृढ़ चरित्र के निर्माण हेतु पौष्टिक विचारों की आवश्यकता है।