मानव जीवन सदैव एक-सा नहीं रहता। आज उतार है, तो कल चढ़ाव।

सृष्टि संचालन के नियमों के अनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होते रहना एक स्वभाभिक बात है। मानव जीवन सदैव एक-सा नहीं रहता। आज उतार है, तो कल चढ़ाव। एकांगी विचार प्रेरित मनुष्य इस नियति के विधान को नहीं समझ पता। वह अपनी इच्छा के अनुकूल परीस्थितियों में ही सुख का अनुभव करता है, तो विपरित परीस्थितियों में दुःखी हो जाता है। एकांगी दृष्टिकोण के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई।

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भारी शारीरिक श्रम करने से लोग जी चुराते हैं।

जैसे भारी शारीरिक श्रम करने से लोग जी चुराते हैं, वैसे ही तीक्ष्ण वेधक दृष्टि से सत्य के तथ्य तक पहुंचने का भारी मानसिक श्रम करने का लोगों को साहस नहीं होता। बहुतों में तो इस प्रकार की योग्यता भी नहीं होती, जिनमें होती है वे अपने परमप्रिय विषय को छोड़कर अन्य विषयों में गंभीर दृष्टि डालने का प्रयास नहीं करते। इस प्रकार से आमतौर से देखा-देखी नकल करने की परंपरा चल पड़ती है। यही परंपराएँ कालांतर में विश्वास-बीज बन जाती हैं।

सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं।

सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं, वरन मन की दशाओं का नाम है। संतोष और असंतोष वस्तुओं से नहीं वरन भावनाओं और मान्यताओं से होता है। इसलिए उचित यही है कि सुख-शांति की परिस्थितियाँ ढूँढते-फिरने रहने की अपेक्षा अपने दृष्टिकोण को ही परिमार्जित करने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में हम जीतने ही सफल होंगे, अंतःशक्ति के उतने ही निकट पहुँच जायेंगे।

अहंकार अज्ञान का द्योतक

अपनी बात को ही प्रधान मानने और ठीक मानने का अर्थ और सबकी बातें झूठा मानना है। इस प्रकार का अहंकार अज्ञान का द्योतक है। इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है, सत्य की प्राप्ति नहीं होती। सत्य की प्राप्ति होना तभी संभव है, जब हम अपनी भूलों, त्रुटियों और कमियों को निष्पक्ष भाव से देखें। अपने विश्वास-बीजों का हमें निरीक्षण और परीक्षण करना चाहिए। जैसे चतुर किसान अपने खेत में उगे हुए झाड़-झंखाड़ों को अपना नहीं समझता, न उनसे अपने मन का मोह करता है, वरन् उन्हें निष्ठुरतापूर्वक उखाड़कर फेंक देता है, उसी प्रकार हमें अपने संस्कारों को उखाड़-उखाड़कर फेंक देना चाहिए ।

मनुष्य परीस्थितियों का दास नहीं।

असफलताओं का दोष भाग्य, भगवान, ग्रह दशा अथवा संबंधित लोगों को देकर मात्र मन को बहलाने की आत्म प्रवाचना की जा सकती हैं उसमें तथ्य तनिक भी नहीं हैं। संसार के प्रायः सभी सफल मनुष्य अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़ें हैं। उन्होनें कठोर श्रम और तन्मय मनोयोग का महत्व समझा है। यही दो विशेषताएँ जादू की छड़ी जैसा काम करती है और घोर अभाव की घोर विपन्नताओं की परीस्थितियों के बीच भी प्रगति का रास्ता बनाती है। मनुष्य परीस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है।

व्यक्तित्व परिष्कार के चरण

अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग निरंतर किए जाते रहे तो चिंतन, चेतना व चित्त के परिष्कार की प्रक्रिया भी निरंतर होती रहती है। यदि इसमें किसी भी तरह की बढ़ा आए तो परिष्कार की प्रक्रिया भी बाधित होती है। अंतर्यात्रा विज्ञान व परिष्कार , दोनों एक दूसरे का परिचय व पर्याय कहा जा सकता है। यहाँ तक कि परिष्कार को अंतर्यात्रा विज्ञान कि संपूर्ण विधि-व्यवस्था व इसके विज्ञान-विधान का सारभूत परिणाम भी समझा जा सकता है। हाँ!इस कथन के साथ यह सच भी जुड़ा हुआ है कि इस परिष्कार के कई चरण हैं। इसका प्रथम चरण है – व्यवहार का परिष्कार और दूसरा चरण है – चिंतन का परिष्कार । इसके बाद तीसरा व अंतिम चरण – संस्कार का परिष्कार

संपूर्ण जीवन का क्रम

संपूर्ण जीवन का क्रम ही ऐसा ढालना चाहिए, जिससे आसक्ति की प्रगाढ़ता न पनपे और अनासक्ति-भाव जीवन तथा चिंतन में घुलमिल जाए। प्रसन्न-प्रफुल्ल, हल्की-फुलकी महावेश रहती जिंदगी जीने का अभ्यास कर लेने पर मृत्यु के समय न तो पीड़ा होती, न छटपटाहट।