इच्छाए मनुष्य के जीवन के साथ जुड़ी है।

इच्छाए मनुष्य के जीवन के साथ जुड़ी है। कोई बच्चा हो ,युवा हो या वृद्ध ,उसके मन मे कुछ करने ,कुछ पाने की इच्छा जरूर होती है, जिसे वह पूरा करना चाहता है। छोटा बच्चा जब से होश संभालता है, अपने माता पिता के सामने अपने इच्छाएं प्रकट करने लगता है। पहले उसकी इच्छाएँ छोटी होती है, जिन्हे प्रायः आसानी से पूरा किया जा सकता है ,जैसे अमुक चीज खाने की इच्छा, खिलौना चाहे कॉपी, किताब, पेन पाने की इच्छा। जब उसे इच्छित वस्तु मिल जाती है तो वह बहुत खुश हो जाता है, और न मिलने पर निराश हो जाता है। बड़े होने पर उसकी इच्छाएं भी बदल जाती है और अपने भविष्य के सपने बुनना प्रारंभ कर देताहै। अपने सपनो को पूरा करने के लिए वह भरसक प्रयत्न भी करता है ।

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आज के समय

आज के समय मे दुनिया मे तेजी से बदलाव आ रहा है। दुनिया तेज गति से दौड़ती चली जा रही है | उसकीचाहत इस गति मे किसी भी तरह की कमी नहीं करना चाहती , इसलिए सभी लोग इस ढैड मे समलित होते जा रहे है। आगे बढ़ने की होड़, अधिक पैसा कमाने की होड़,बहुत जल्दी बहुत पाने की तीव्र ईछा एव तेज गति से सब काम करने की चाहत ने आज व्यक्ति की जीवनशैली मे बहुत व्यस्तता ला दी है |आज दुनिया मे उन वस्तुओं कीमाग कोई कीमत नही रह गईहै,जिनके काम करने मे बहुत अधिक मेहनत व समय लगाता है| अब पुरानी टेक्नोलॉजी के स्थान पर नई टेक्नोलोजी तेजी से अपनी जगह बना रही है|

अपने को असमर्थ अशक्त,एवं असहाय मत समझिए, ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही है, उन्नति करने कि तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिए साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे ईश्वर उन लोगों कि पीठ पर अपना वरद हस्त रखता है, जो हिम्मत के साथ आगे कदम बढ़ाते है। आगे बढ़िए, आत्मउन्नति कीजिए। ऊँचे पद पर चढ़ने का उद्योग कीजिए, पुण्य संचय करिए।

मनुष्य जीवन मे सफलता-असफलता, सुख-दुख, जय-पराजय सभी कुछ उसकी मनोदसा पर अवलंबित है

मनुष्य जीवन मे सफलता-असफलता, सुख-दुख, जय-पराजय सभी कुछ उसकी मनोदसा पर अवलंबित है। आवमानव जो कुछ भी इच्छा करता है, वह उसे प्राप्त कर सकता है, परंतु उसके साथ आत्मविश्वास की नितांत आवश्यकता होती है और जिस कार्य मे आत्मविश्वास का अभाव होता है, वह कार्य असफल होता है। मनुष्य के मन मे बहुत सी सूक्ष्म क्रियाएँ निरंतर कार्यान्वित रहती है, जो उसका भविष्य निर्माण किया करती हैं। अगर मानव उन क्रियाओं को उचित रूप से व्यवस्थित करे, तो जीवन मे बहुत कुछ सुगमता से ही उपलब्ध कर सकता है।

श्रम स्वर्ण का एक ढेला है

परिश्रम यदि विवेक और व्यवस्था के साथ उचित दिशा मे किया जाए तो उसका परिणाम आश्चर्यजनक होता है । श्रम स्वर्ण का एक ढेला है , उसे जिस ढ़ाचे में ढाल दीजिए वह वैसा ही आभूषण बन जाएगा , जिस भी दिशा में मनुष्य मेहनत करता है उसी दिशा में समृद्ध हो जाता है । जिन्हे अपने जीवन को उन्नत बनाना हो , उन्हे परिश्रम से प्यार करना चाहिए । अपने को मेहनती बनाना मानो उन्नति के द्वार पर पर्दापन करना है ।

जीवन एक यथार्थ है और इसे कड़ुई हकीकत से सामना करना पड़ता है।

जीवन न तो चमत्कार से चलता है और न अंधविश्वास के साये से पलता-बढ़ता है। जीवन एक यथार्थ है और इसे कड़ुई हकीकत से सामना करना पड़ता है, गुजरना पड़ता है। किसी चमत्कार के सहारे जीवन की दशा और दिशा को बदला नहीं जा सकता है। जीवन ओझाओं,बाबाओ और तांत्रिको के हाथ की कठपुतली नहीं है। अगर ऐसा होता तो अंधविश्वास के ये सगिर्द सबसे पहले स्वं को बदल नहीं लेते।

निराशा का मनुष्य के दृष्टिकोण से अधिक संबंध होता है।

निराशा का मनुष्य के दृष्टिकोण से अधिक संबंध होता है। जैसी उनकी भावनाएं होती हैं। वैसी ही उनको प्रेरणायें भी मिलती है। जिनका दृष्टिकोण भावनायें स्वार्थप्रधान होती है, जो अपने ही लाभ के लिये जीवन भर व्यस्त रहते है। उन्हें निराशा असंतोष अवसाद ही परिणाम मे मिलता है। यह एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक सत्य है। जिनके जीवन मे परमार्थ, सेवा, जन,-कल्याण की भवनायें कार्य करती हैं। उनमे आशा, उत्साह, प्रसन्नता की धारा निः सृत होती रहती है। अतः हम दूसरों की सेवा करके, दूसरों के लिये भले कामकरके निराशा से पीछा छुड़ा सकते है।