सफल जीवन जीने की आकांक्षा यदि साकार करनी हो तो।

सफल जीवन जीने की आकांक्षा यदि साकार करनी हो तो पहला कदम आत्म-निरीक्षण में उठाया जाना चाहिए। अपने विचारों, मान्यताओं, आस्थाओं आदि की समीक्षा करनी चाहिए और उनमें जितने भी अवांछनीय तत्व हों, उन्हें उन्मूलन करने के लिए जुट जाना चाहिए। यह तभी संभव है, जब उनकी स्थानपूर्ति के लिए सदविचारों के आरोपण की व्यवस्था बना ली जाए

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साहस और पुरुषार्थ के बिना किसी का आगे बढ़ सकना संभव नहीं।

जीवन एक खेत है। उसमें प्रगति और सफलता की फसल उगाई जानी है तो ऐसे विचारों का मन:क्षेत्र में आरोपण करना चाहिए जो प्रगति के लिए आवश्यक शक्ति का उदभव कर सकें। साहस और पुरुषार्थ के बिना किसी का आगे बढ़ सकना संभव नहीं। आलस्य और अनियमितता का अवरोध रहते, कोई व्यक्ति किसी प्रयोजन में सफल नहीं हो सकता। इन दुर्बलताओं को हटाने के लिए खेत में खर-पतवार उखाड़ने जोतने की तरह हमें किसान का अनुकरण करना होगा।

सत्संग करने से मनुष्य के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।

विचारों का विकास एवं उनकी निर्वकारिता दो बातों पर निर्भर है- सत्संग एवं स्वाध्याय। विचार बड़े ही संक्रामक, संवेदनशील तथा प्रभावग्राही होते हैं। जिस प्रकार के व्यक्तियों के संसर्ग मे रहा जाता है, मनुष्य के विचार भी उसी प्रकार के बन जाते हैं। व्यवसायी व्यक्तियों के बीच रहने, उठने-बैठने, उनका सत्संग करने से ही विचार व्यावसायिक, दुष्ट तथा दुराचारियों की संगत करने से कुटिल और कलुषित बन जाते हैं। उसी प्रकार चरित्रवान तथा सदात्माओं का सत्संग करने से मनुष्य के विचार महान एवं सदाशयतापूर्ण बनते हैं।

मनुष्य की इच्छा आकांक्षा कुछ अर्जित करने की होती है।

मनुष्य की इच्छा आकांक्षा कुछ अर्जित करने की होती है। अपना विकास करने की,अपनी योग्यताएँ बढ़ाने की, उपलब्धियाँ अर्जित करने की तथा विभूतियाँ बढ़ाने की। इन्हीं आकांक्षाओं से उसका जीवन प्रेरित-संचालित रहता है, लेकिन प्राय: होता यह है कि हम जीवन की उस जीवन प्रेरणा को समझने में और उसे उनके यथार्थ रूप में ग्रहण करने में चूक जाते हैं। हम उन्हीं दिशाओं में अग्रसर होने लगते हैं, जिनमें कि अन्य लोगों कि प्रवृत्ति देखते हैं। दूसरे लोग किन स्थितियों में वे गतिविधियाँ अपनाते हैं, इस तथ्य पर ध्यान देने की अपेक्षा हमारी दृष्टि में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसके आस-पास के लोग उसकी उपलब्धियों को किन संदर्भों में लेते हैं।

असफलता से हतोत्साही न हों।

पहले अपनी शक्तियों, योग्यताओं और विशेषताओं को देखिए। योग्यता वृद्धि के लिए प्रथम तत्व अध्ययन और परिश्रम है। योग्यता बढ़ाने के लिए जब आप अग्रसर हों तो शत्रुओं से सावधान रहें-(1) निराशा का त्याग करें, (2) असफलता से हतोत्साही न हों। इनसे उन्नति का मार्ग कंटकाकीर्ण होता है, पग पग पर छिद्रान्वेषण होता है। किन्तु सावधान निराश न हों। आत्मप्रेरणा से कठिनाइयों को चीरते हुए निरंतर अग्रसर हों। यदि एक दो बार असफल हो जाएँ तो मार्ग न त्यागें, डटें रहें।

ज्ञान ही प्रगति की आधारशिला है।

आज मनुष्य जितनी प्रगति कर सका है, उसके महत्वपूर्ण आधारों में एक बौद्धिक संपदा का पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षण-संवर्धन भी है। ज्ञान ही प्रगति की आधारशिला है, ज्ञानरहित मनुष्य अन्य पशुओं की तरह ही आदिम, अनगढ़ अपरिष्कृत प्रवृतियों और आवेगों से परिचालित जीवन जीता है और मानवीय गरिमा का अर्थ तक नहीं समझ पाता।

अविकसित मनोबल के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती।

जीवन एक संग्राम है, जिसमें विजय केवल उन्हीं को मिलती है, जो दृढ़ और उन्नत मनोबल का कवच धारण किए रहते हैं और जो अपने निहित पराक्रम और पौरुष की उत्कृष्टता सिध्द करते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य ठीक हो, पर मनोबल न हो, तो आदमी मानसिक आघात से अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है । अविकसित मनोबल के कारण हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती । हमारा मन हारा रहता है तो शरीर भी हारता है और हम पराजित हो जाते हैं ।