सृष्टि की समस्त गतिविधियां किसी अविज्ञात के इशारे

सृष्टि की समस्त गतिविधियां किसी अविज्ञात चेतन सत्ता के इशारे पर संचालित हो रही हैं। संसार में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटित होती हुई देखी जाती है, जो अनायास ही उस परमसत्ता की करुणा एवं कण-कण में उपस्थिति का विश्वास दिलाती हैं। जिस प्रकार अविज्ञात कारणों से कभी-कभी मनुष्य पर अप्रत्याशित विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ता है और प्रत्यक्ष कोई कारण न होने पर भी दुर्घटना स्तर का संकट सहन करना पड़ता है, उसी प्रकार कभी-कभी विपत्तियों से उबारने वाली ऐसी अदृश्य सहायताएं भी अनायास ही मिलती देखी गई हैं, जिनकी न कोई आशा थी और न संभावना।

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सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना ही कुबुद्धि का निवारण है ।

गायत्री सद्बुद्धि ही है। इस महामंत्र में सद्बुद्धि के लिए ईश्वर से प्रार्थना की गई है ।कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्र की तरह प्रभावशाली सिद्ध होते है ।गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य कुबुद्धि का निवारण है ।गायत्री साधना आत्मबल बढ़ाने का अचूक आध्यात्मिक व्यायाम है ।

सौंदर्य कभी मलिन नहीं होता हैं।

जिंदगी एक पहेली हैं। इसके उजालो में अँधेरा भी लिपटा रहता हैं, सुख के साथ दुख भी जुड़ा रहता हैं। जो चमकता हैं उसका बुझना सुनिश्चित हैं, परंतु श्रेष्ठ कर्म की चमक कभी नहीं खोती। सच्चिंतन एवं निष्काम सेवा का सौंदर्य कभी मलिन नहीं होता हैं।मानविये मुल्यों एवं गुणों का सौंदर्य कभी नष्ट नहीं होता हैं।

ईश्वर का असली मंदिर मनुष्य का अपना हृदयस्थल है ।

प्रायः ईश्वर को हम मंदिर , मसजिद , गिरिजाघर , गुरुद्वारों एवं वनों , गुफाओं – कनदराओं आदि जगत में खोजते फिरते हैं , फिर भी वह ढूँढे नहीं मिलता । कारण , उसका असली मंदिर तो और कहीं है । ईश्वर का असली मंदिर मनुष्य का अपना हृदयस्थल है , जो प्रकृति द्वारा निर्मित किया हुआ है और अत्यंत श्रेस्ठ , समुन्नत सुंदर है । यह मंदिर स्वं भगवान का बनाया हुआ है ।

सहायता करने के बाद सम्मान की उम्मीद न करे ।

सहायता करने के बाद सम्मान की उम्मीद न भी की जाए, तो भी सम्मान तो स्वतः ज्ञापन हो जाता है। कष्ठ से पीड़ित व्यक्ति की यदि किसी रूप में उनके पीड़ा निवारण में कोई उपाय–उपचार एवं अन्य किसी प्रकार का सहयोग किया गया और पीड़ित व्यक्ति उसे अपनाकर पीड़ा से मुक्त होता है तो वह दिल से कृतज्ञ होता है। भले ही अभिव्यक्ति के रूप में वह न उतर सके, तो भी दिल से उसे कृतज्ञताज्ञापन कर ही देता है। नीति कहती है कि गुण प्रकाश के समान होता हैं और प्रकाश को बाँटना चाहिए, ताकि अनेकों को इससे नई दिशा मिल सके।

दुःख इनसान को बहुत कुछ देने के लिए आता है ।

दुःख इनसान को बहुत कुछ देने के लिए आता है , यदि उसे विधेयात्मक ढंग से स्वीकार लिया जाय तो । अन्यथा दुःख के भार से जीवन अशहा हो जाता है । दुःख देवो का धन है । उस धन से इंसान अत्यंत मजबूत एवं सुदृढ़ होता है । सुख में यह बात नहीं है । दुःख की तपनभट्ठी में इंसान ऐसे निकलता है जैसे सामान्य लोहे से फ़ोलाद निकलता है। फौलाद बनने के लिए दुःख का वरन करना पड़ेगा ।

अपने आप में विश्वास ।

अपने आप में विश्वास। अपनी अंतर्निहित दिव्यता में विश्वास। सकारात्मक विचार अपनाओ केवल सत्यकार्य करते रहो, सर्वदा पवित्र चिंतन करो बुरे संस्कारो को रोकने का बस यही एक उपाय है। यदि कोई हजार बार प्रयास करके भी वह हर बार असफल होता है, तो भी एक बार प्रयास करें। मनुष्य स्वयं ही अपने भाग्य का निर्माता है। हम जो कुछ होना चाहें। उसकी शक्ति भी हमी में है। निष्काम सेवा करें। एक सुदृढ़ चरित्र के निर्माण हेतु पौष्टिक विचारों की आवश्यकता है।