जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहाँ जीवित रहा जा सकता है।

जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहाँ जीवित रहा जा सकता है। यथार्थ का सामना करके ही आप जीवन-पथ पर चल सकते हैं। ऐसा ही नहीं हो सकता कि जीवन रहे और मनुष्य को बिपरितताओ का सामना न करना पड़े। यदि आप जीवन में आई विरोधी परिस्थितियों से हार बैठे हैं, अपनी भावनाओं के प्रतिकूल घटनाओं से ठोकर खा चुके हैं और फिर जीवन की उज्ज्वल संभावनाओं से निराश हो बैठे हैं तो उद्धार का एक ही मार्ग है -उठिए और जीवन पथ की कठोरताओं को स्वीकार कर आगे बढ़िये। तभी कहीं आप उच्य मंजिल तक पहुँच सकते हैं। जीना है तो यथार्थ को अपनाना ही पड़ेगा। और कोई दूसरा मार्ग नहीं है जो बिना इसके मंजिल तक पहुंचा दे।
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अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के सरल उपाय ।

अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो उठिए, अपनी शक्तियों को बढ़ाइए, अपने अंदर लगन, कर्मण्यता और आत्मविश्वास पैदा कीजिए। हमेशा अनुभव करते रहें कि मैंने अपने सिर पर लक्ष्य प्राप्ति का कफन बांधा हुआ है और इसके मार्ग में आने वाली हर विघ्न व बाधा का सामना करने के लिए अपनी कमर कस ली है। अब संसार की कोई शक्ति मुझे लक्ष्य-प्राप्ति से रोक नहीं सकती। ऐसे दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ने पर आप पाएँगे कि कदम-कदम पर सफलता परछाईं की तरह आपके साथ है।

विकसित होने का अर्थ है अपनी अंतर्निहित शक्तियाँ

यौवन इस बात पर निर्भर नहीं है कि हम कितने छोटे हैं, बल्कि इस पर कि हममें विकसित होने कि क्षमता एवं प्रगति करने की योग्यता कितनी है। विकसित होने का अर्थ है अपनी अंतर्निहित शक्तियाँ, अपनी क्षमताएं बढ़ाना। प्रगति करने का अर्थ है अब तक अधिकृत योग्यताओं को बिना रुके निरंतर पूर्णता की ओर ले जाना। बुढ़ापा आयु बड़ी हो जाने का नाम नहीं है, बल्कि विकसित होने और प्रगति करने की अयोग्यता का पर्याय है। जो अपने आप को निष्कपट, साहसी, सहनशील, ईमानदार बना सकेगा,वही राष्ट्र की सर्वाधिक सेवा करने के योग्य है। उसे ही अद्वितीय एवं महान कहा जा सकता है।

स्मरण रखो, पूरा जीवन देने के लिए ही है

स्मरण रखो, पूरा जीवन देने के लिए ही है। प्रकृति देने के लिए तुम्हें विवश करेगी इसीलिए अपनी खुशी से ही दो। तुम संग्रह करने के लिए ही जीवन धरण करते हो, मुट्ठी-बंधे हाथ से तुम बटोरना चाहते हो, पर प्रकृति तुम्हारी गर्दन दबाती है और तुम्हारे हाथ खुल जाते हैं। तुम्हारी इच्छा हो या न हो, तुम्हें देना ही पड़ता है। जैसे ही तुम कहते हो मैं नहीं दूंगा एक घूंसा पड़ता है और तुम्हें चोट लगती है। ऐसा कोई भी नहीं है, जिसे अंत में सब कुछ त्यागना न पड़ें।

दृढ़ संकल्प से क्रांतिकारी परिवर्तन

यदि मनुष्य मे दृढ़ संकल्प हो तो वह साधारण परिस्थित्यों मे रहकर भी अपने मे क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है ।जिसकी आत्मा ऊपर उठने के लिए आगे बढ़ने के लिए बेचैन होती है , संयोग से मार्ग दर्शन भी अच्छा मिल जाता है ।जिसने आत्मा को अपना मित्र बना लिया होता है ,परोपकार एवं परमार्थ को अपना धेय बना लिए होता है ,अपने को कर्तव्य की वेदी पर समर्पित कर दिया होता है वह अकेला होने पर भी अकेला नहीं रहता ।